ग़ज़ल(4) 

​इतने फ़िगार हैं कि फसाने नहीं आते अब रात भर जगने के बहाने नहीं आते वादा-ए-वस्ल करके वो कुछ गुम हुए ऐसे अब ख्वाब में भी अक्स… Read more “ग़ज़ल(4) “