Tab kuch baat alag thi

​कभी चिठ्ठियाँ पतंगों से बाँध देते थे

अब घर बैठे इश्क़ का जमाना आ गया

तब कुछ बात अलग थी, अब कुछ बात अलग है।

कभी कच्ची सड़को पर दौड़ते थे बेहिसाब पहिये

अब तो बचपन खुद से ही डरने लगा है

तब कुछ बात अलग थी अब कुछ बात अलग है।

उन कच्ची इमलियों पर नमक के कुछ छींटे 

आज भी खट्टे दाँतो की मीठी यादें ताज़ा कर देते है

तब कुछ बात अलग थी अब कुछ बात अलग है।

अब हँस लेते है लोग ना चाहते हुए भी

कभी शाम को ठहाकों की चौपाल लगा करती थी

तब कुछ बात अलग थी अब कुछ बात अलग है।

कभी चूल्हे पर सिकती थी ईमान की रोटी

अब बेईमान गैस का जमाना आ गया

तब कुछ बात अलग थी अब कुछ बात अलग है।

कभी होतीं थी शादियाँ एक रेडियो के बदले

अब एक रूपए कम हो तो बारात लौट जाती है

तब कुछ बात अलग थी,अब कुछ बात अलग है।

तब फर्श पर भी चैन की नींद सो लेते थे लोग

अब तो बेड पर भी करवटें बदलते देखा है

तब कुछ बात अलग थी, अब कुछ बात अलग है।

कभी मायूस चेहरे इंसानों के देखो

फिर संसद में बैठे शैतानो के देखो

अगर फर्क समझ आ जाए तो फिर मुझसे कहना

तब कुछ बात अलग थी अब कुछ बात अलग है।

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27 thoughts on “Tab kuch baat alag thi

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