जिंदगी और ट्रेन

जिंदगी भी किसी ट्रेन के सफर की तरह ही लगती है। गुज़रती है टेढ़े-मेढ़े रास्तों से। कभी तेज भागती है तो कभी ठहरकर चलती है। कुछ लोग जो हमें एक स्टेशन पर मिलते हैं, अगला स्टेशन आते ही अक्सर हमसे दूर हो जाते हैं। कुछ साथ चलते हैं। अंतिम स्टेशन तक। दोनों ही सफर में हम सीखते हैं कि कुछ और भी हैं। हमारे ही जैसे। खुश, मायूस, परेशान, पागल, अमीर,गरीब। हर स्टेशन पर हम उत्तेजित हो जाते हैं कि अभी कितना सफर बाकी है, अक्सर पूँछते हैं हमारे इर्द-गिर्द मौजूद शख्स से,जो फिर देखता है, किसी तीसरे की ओर। कुछ अजनबी दोस्त बन जाते हैं, तो कुछ दोस्त अजनबी। जब किसी की कहानी हमें अपने जैसी ही लगती है तो हम उसके थोड़ा और करीब आने की कोशिश करते हैं। अच्छा हमसफ़र मिल जाए तो वक्त जल्दी कट जाता है। दोनों अक्सर दूसरों को मौका जरूर देतीं हैं। ताकि सब वक्त रहते अपनी-अपनी मंज़िल तक पहुँच सकें। पर हर मंज़िल अक्सर एक नयी शुरुवात ही होती है। जहाँ से दोनों वापिस पलटकर फिर आगे बढ़ जातीं हैं। ताकि फिर से कुछ नए मुसाफिरों से मिल सकें। फिर किसी नए अजनबी को दोस्त बना सकें। 

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