Dil ki baat

​ज़िन्दगी अगर एक सफर है तो मैं कभी न थकने वाला मुसाफ़िर बन चुका हूँ। मैंने हमेशा अतीत को बार-बार कोसने की बजाय वर्तमान और भविष्य को तराशने की पूरी कोशिश की है। इसे नापने के लिए कोई पैमाना तो नहीं है और न ही मैंने ढूंढने का कभी प्रयास किया, बस कभी-कभी सोने से पहले आत्मचिंतन कर लेता हूँ कि हाँ सब ठीक है। और आने वाले समय में भी सब ठीक ही होगा। आधे से ज्यादा समय तो हम यही कहने में निकाल देते हैं कि “यह न होता तो अच्छा होता” अब अगर यह न होता तो निश्चित कुछ और होता और फिर शायद वह भी पसंद नहीं आता। इसलिए जरूरी है कि जो है उसे ही उसमें परिवर्तित किया जाए जो आपके अनुसार होना चाहिए था। रिश्तों को कागज की तरह समझकर मैंने उतना ही सँभालने की कोशिश जितना मैंने खुद को उनकी जिंदगी में लिखा पाया। जिन किरदारों की जिंदगी में मैं कम लिखा गया उन्हें या तो वक्त से साथ मैंने फाड़कर फ़ेंक दिया या उन्हें चिपकाकर कहीं महफूज़ रख दिया। लिखना मेरे लिए हमेशा से खुद से मिलने जैसा रहा है। इसलिए जब भी लगता है कि आज मन साफ़ नहीं है या आज दिल लिखने की गवाही नहीं दे रहा उस दिन शब्दों को आराम करने भेज देता हूँ। कभी-कभी कोई पूछ लेता है कि क्यों लिखते हो? या कैसे लिखते हो? तो उनको देखकर बस मुस्कुरा देता हूँ और मन ही मन सोचता हूँ कोई क्यों मंदिर जाता है? या क्यों इबादत करता है? या क्यों साँस लेता है? आजकल कई नए-नए लेखक उभरकर आ रहे हैं जो यहाँ-वहाँ से दो चार शब्द लिखकर उसे लेखन का नाम दे देते हैं। एक अच्छे लेखन के लिए जरुरी है कि हम अपने एहसास को सही शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत करें। मेरे अनुसार लेखन कोई प्रोफेशन नहीं है, कम-से-कम तब तक जब तक आप उम्र की ऐसी सीमा को पार नहीं कर लेते जिसमें आप खुद के लिए लिखने के बाद अब अपना घर चलाने के लिए लिख रहें हों। जो देखें जो महसूस करें उसे ही लिखें। मुझे प्रद्युम्न की यही बात अच्छी लगती है। वह जो देखता है जो महसूस करता है लिख देता है। किसी के कहने या किसी प्रतिस्पर्धा का इंतजार नहीं करता। सच बोलने वाले लोग कड़वे जरूर हो सकते हैं लेकिन झूठ बोलकर अँधेरे में रखने वाले लोगों से कई गुना बेहतर होते हैं। मनुष्य के स्वाभाव की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम उन्हीं लोगों को पसंद करते है जो हमें ठीक वैसा ही प्रस्तुत करें जैसा हम खुद को देखना चाहते हैं और इसी चक्कर में जब हम खुद को अचानक किसी दिन आईने में देखते हैं तो फिर उन्हीं लोगों से नफरत करने लगते हैं। इसलिए जरूरी है खुद के अंदर सही-गलत पहचानने की कला विकसित करें। मैं जानता हूँ मैं क्या हूँ और कैसा हूँ। इसके लिए मुझे किसी के प्रमाण की आवश्यता नहीं है। मुझे खुद से बेहतर भला कौन बता सकता है कि मैं क्या हूँ? याद रखिए अगर कोई आपको गिराने की कोशिश करे तो बस मुस्कुराइए क्योंकि ऐसे लोग आपको गिराने में सफल हो न हो पर आपके जाने के बाद आपको अपने कंधे पर उठाने में अवश्य सफल हो जाते हैं। 

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