Book review: Theek tumhare peeche| story 2

A book by Manav Kaul

Thank you guys for all your love and support. After the first story Aaspaas kahi of his book Theek tumhare peeche” I’m gonna review his second story titled abhi-abhi se kabhi-ka tak.


दूसरी कहानी– अभी-अभी से कभी-का तक।

प्रयाग को इस बात की चिंता है कि सूरज के चेहरे पर मूँछ क्यों नहीं है। सूरज उसका दोस्त जो हस्पताल में उससे मिलने आया हुआ है। एक कमरा, कुछ लोग, जो उसके अनुसार किसी मंच की तरह है। खट-खट छप-छप की कुछ आवाज़े। जहाँ सभी एक मरीज की भूमिका निभाने में व्यस्त हैं। एक बुजुर्ग आदमी जो रोज अपना चश्मा ढूंढता है। जिसका नाम निरंजन है। पर जिस दिन चश्मा मिल जाता है उस दिन वह उतना खुश नहीं होता जितना उसे चश्मा मिलने की ख़ुशी में होना चाहिए था। प्रयाग हर हाल में महज दर्शक बना रहना चाहता है। पर सिर्फ दर्शक बनना इतना आसान नहीं है। एक औरत जो पूरे कमरे को नीले आसमान में बदल देना चाहती है। जो शायद पागल है और जब भी उसे मौका मिलता है तो वह कमरे की सीलिंग को नीले रंग से रंगने चली आती है। कभी बादल कभी हंस। एक दिन नील उससे मिलने आती है। नील, जो कभी उसके लिये वह थी जो अब वह उसके दोस्त सूरज के लिए है। उसके आने के बाद प्रयाग को पता चलता है कि वह ठीक नहीं है। पर उसे हुआ क्या है यह कोई नहीं बताता। एक दिन नील सूरज से साथ मिलने आती है। अब दोनों शादी कर चुके हैं। दोनों उससे बात करते-करते ‘दूर गगन की छाँव’ में कहीं देखते हैं। प्रयाग को अब अभी भी यही लगता है कि मूँछ नहीं है। निरंजन भी एक दिन उससे कहता है कि मूँछ बाकई नहीं है। वह उसे बताता है कि एक दिन वह भी उसी पलंग पर था जिसपर अब प्रयाग है। जो अभी-अभी का पलंग है। कुछ दिनों बाद वह भी कभी-का के पलंग पर पहुँच जाएगा जहाँ अभी कोई और है। और प्रयाग को उसका पलंग मिलेगा। घड़ी की सुई की तरह सब को एक मिनट आगे बढ़ना है। प्रयाग का एक और दोस्त है जिसका नाम हंसा है। जो कभी किसी को ना नहीं कहता। वह हमेशा हर काम की पर्ची जेब में रखकर निकलता है। एक दिन जब कोरी पर्ची निकली तो वह उस समय में प्रयाग से मिलने पहुँचा। हंसा अब इस मुसीबत में है कि वह अब किस काम के तहत प्रयाग से मिलने आएगा। फिर निरंजन उसे एक काम देता है। किसी किताब का शुरआती हिस्सा लाने का कहकर। जो उसके अनुसार लेखक ने शायद लिखा ही नहीं है। जिसमे पीपल की सूखी पत्ती है। एक दिन अचानक हलचल बढ़ती है और कभी-का का पलंग खाली हो जाता है। सब एक-एक पलंग आगे बढ़ जाते हैं । अभी-अभी के पलंग पर एक दूसरा लड़का आ जाता है। उसकी बूढ़ी माँ कभी-कभी उसने मिलने आती है। छत पूरी नीली हो चुकी है। निरंजन को अब भी हंसा का इंतजार है। 

किसी हस्पताल का इससे बेहतरीन चित्रण शायद ही किया जा सकता है। मानव की मूँछ वाली बात निश्चित तौर पर काफी गहरी है। किस तरह हमें यह कहकर-कहकर बीमार कर दिया जाता है कि बाकई बीमार हैं। जैसे मूँछ नहीं है। खट-खट की आवाज़ जहाँ सूट-बूट वालों की प्रतीक है वहीं छप-छप बेबस और लाचार। एक नर्स जो शायद इसलिए नाराज है क्योंकिं वह डॉक्टर नहीं नर्स है। महज दर्शक बनना वास्तव में काफी कठिन है। कम-से-कम आप अगर इंसान हैं तो। पलंग पर आगे बढ़ने वाली बात यह दर्शाती है कि जीवन हर हाल में आगे बढ़ना है। और खिसकती सुइयों के साथ आप और बीमार होते चले जाते हैं। यह किसी ऐसे जाल की तरह है जिससे निकल पाना इतना आसान नहीं है। एक औरत जो शायद जब हस्पताल आयी होगी तो कम पागल होगी पर अब वह ज्यादा पागल है। कम पागल और ज्यादा पागल का अंतर सिर्फ हस्पताल ही हमें बता सकता है। हंसा जो हर काम के लिए एक दूसरे काम की तलाश करता है। जो एक जेब वाली शर्ट तो पहनता है पर दो  जेब वाली शर्ट पहनने से कतराता है। शायद ऐसा करने से जिम्मेदारी बढ़ने का डर बना रहता है। ‘दूर गगन की छाँव’ वाली बात यह दर्शाती है कि लोग किस तरह किसी भी संवाद का हिस्सा होने से बचने का प्रयास करते हैं। अच्छी कहानी शानदार चित्रण मानव कॉल दूसरी कहानी को भी बेहतरीन बनाता है।

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