Indian Classics: Shahid 2013

 Movie we will discuss today– Shahid 

फिल्म के पहले ही दृश्य में शाहिद एक बात कहता है कि “जुर्म करने वाले और जुर्म सहने वाले का कोई मज़हब नहीं होता। इसमें मारता भी इंसान ही है और मरता भी इंसान ही है”

अच्छे दृश्यों और बेहतरीन संवादों से सजी यह फिल्म हंसल मेहता की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक है। राजकुमार राव ने अपने शानदार अभिनय से शाहिद आज़मी के किरदार को कभी न भूलने वाला किरदार बनाया है। अन्य किरदार जैसे मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब, प्रभलीन संधु, बलजिंदर कौर ने भी एक अच्छे परिवार को स्थापित करने में पूरा योगदान दिया। 

के.के मेनन द्वारा शाहीद से जेल में कही गयी बात “If you want to change the system be a part of it” निश्चित तौर पर एक अच्छी सोच एवं लेखन का प्रतीक है। पिछले कुछ सालों में हंसल मेहता ने राजकुमार राव के साथ मिलकर काफी प्रभावशाली फिल्मों का निर्माण किया है। चाहे वह सिटी लाइट्स हो या फिर अलीगढ़। समाज के सामने अच्छा मनोरंजन परोसने की कला उन्हें बखूबी आती है। शाहिद भारतीय कानून व्यवस्था पर सवाल उठाती एक बहुत ही उम्दा फिल्म है। किस तरह मासूम और गरीब लोगों से जेलखाने भरे जाते हैं और सालों तक उन्हें बिना किसी गलती के जेल में सड़ने के लिए डाल दिया जाता है निश्चित रूप से दयनीय है। ऐसे हालात में इंसान जेल से रिहा तो हो जाता है पर उसके नसीब में आती है सिर्फ जिल्लत भरी जिंदगी और हर कदम पर मुँह मोड़ता समाज। फिल्म में दिखाए कुछ दृश्य बहुत ही प्रभावशाली हैं जिन्हें सिर्फ फिल्म देखकर ही समझा जा सकता है। कुल-मिलाकर शाहिद एक क्लासिक हिट है जिसको एक बार देखना अवश्य बनता है।

अगर आप यह फिल्म देख चुके हैं तो इसके बारे में आपके विचार मुझसे कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें।

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