Indian classics: Ship of Theseus

Film we are gonna discuss today– Ship of Theseus


आज हम बात करने वाले हैं राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित फिल्म शिप ऑफ थीसियस की। 2013 में आयी इस फिल्म का निर्देशन और लेखन दोनों ही आनंद गांधी ने किया है। यह फिल्म तीन अलग-अलग किन्तु बेहद संवेदनशील कहानियों का मिश्रण है। और तीनों ही कहानियों का एक सार है–

“अगर एक जहाज के सभी पुर्जे बदल दिए जाएं तो क्या वह वही जहाज रहेगा जो पहले हुआ करता था”

फिल्म की पहली कहानी एक ऐसी लड़की के बारे में है जो देख नहीं सकती। जिसका नाम आलिया है। आलिया एक फोटोग्राफर है। वह अपने बल पर जगह-जगह घूमकर फोटोग्राफी करती है। अपनी खुद की बनायीं डिजिटल पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगाती है। इसके साथ ही वह यह भी चाहती है कि कोई उसे सिर्फ इसलिए सहानुभूति न दिखाए क्योंकि वह देख नहीं सकती। फिर एक दिन सर्जरी के बाद उसकी आँखों की रोशनी वापिस आ जाती है। और वह जिंदगी और अपनी पहचान को सही मायने देने के लिए एक सफर पर निकल जाती है। 

Some beautiful snaps from first story:

फिल्म की दूसरी कहानी एक भिक्षु के बारे में है जिसका नाम मैत्रेय है। मैत्रेय एक आम जिंदगी जीने के साथ-साथ लैब में इस्तेमाल किये जाने वाले जानवरों पर होने वाले प्रयोगों के खिलाफ संघर्ष करता है। वह इसके लिए कोर्ट में याचिका भी दायर करता है,जहाँ उसकी मुलाकात होती है उसकी उम्र से छोटे एक वकील चारवाक से। चारवाक को जब भी समय मिलता है वह जिंदगी और उससे जुड़ी मान्यताओं पर चर्चा करने के लिए मैत्रेय से मिलने पहुँच जाता है। एक दिन मैत्रेय की अचानक तबियत बिगड़ती है और उसे पता चलता है कि वह लीवर सिरोसिस से पीड़ित है। वह एक भिक्षु होने के नाते दवाइयां लेने से इंकार कर देता है और आमरण उपवास रख लेता है। फिल्म की दूसरी कहानी में एक बहुत अच्छा संवाद आता है–

“The soul is formless, shapeless, it’s non matter and it connects to the world through the body and every minute action even non-action leaves behind a kaarmic record on the soul.The purpose of our existence is enlightenment and eventual liberation from the perpetual suffering of life and death”

फिल्म की तीसरी कहानी एक स्टॉकब्रोकेर नवीन के बारे में है। नवीन अपनी किडनी ट्रांसप्लांट होने के बाद अस्पताल से वापिस अपनी नानी के घर पहुँचता है। उसकी नानी उसके लिए एक पार्टी प्लान करती हैं पर एक दुर्घटना से उनके पैर में चोट आ जाती है और उन्हें अस्पताल भर्ती किया जाता है। नवीन की नानी ने शुरू से समाज को कुछ न कुछ देते रहने का प्रयास किया है। वह जिंदगी को खुल के जीने उसके सही मतलब खोजने में विश्वास रखतीं हैं। जबकि नवीन के अनुसार उसके दिल में दूसरों के लिए दया का भाव और दूसरों के मन में उसके प्रति सम्मान ही उसकी जिंदगी की सीमा तय चुका है। वह इसके अलावा कुछ अलग करना ही नहीं चाहता। एक दिन अस्पताल में जब उसे पता चलता है कि किसी आदमी की किडनी ऑपरेशन के बहाने उसके शरीर से गायब कर दी गयी तो वह इसकी जाँच-पड़ताल करता है। नवीन और उस आदमी के ऑपरेशन में महज एक दिन का फर्क होने के कारण उसे यह शक होता है कि कहीं उसे चोरी की गयी किडनी तो नहीं लगाई गई। जाँच-पड़ताल करते-करते नवीन अंत में उसके असली गुनहगार तक पहुँच जाता है। और इस छोटे से सफर के दौरान जिंदगी से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आतीं हैं। 

फिल्म की तीनों कहानियां चार अलग-अलग भाषाओं में बनायीं गयीं है। पहली कहानी इंग्लिश और अरबी, दूसरी कहानी इंग्लिश और हिंदी वहीं तीसरी कहानी हिंदी जिसमें कुछ हिस्सा स्वीडिश का भी शामिल है। आलिया का रोल अदा किया है आदिया अल-ख़शेफ़ ने। मैत्रेय का किरदार निभाया है नीरज काबी ने, जिन्हें हम फिल्म तलवार में डॉ.टंडन के रूप में जानते हैं। नवीन के रूप में नज़र आये हैं सोहम शाह। और विनय शुक्ला ने निभाया है चारवाक को। फिल्म के निर्देशन के लिए आनंद गांधी की तारीफ बनती है। उन्होंने जिस तरह से अलग-अलग संबंधों को समझाया है वह लाज़वाब है। बेहतरीन अभिनय,दमदार संवाद,खूबसूरत शॉट्स और जिन्दगीं के मायने समझाती यह फिल्म निश्चित तौर पर देखी जानी चाहिए। क्योंकि फिल्म में बहुत कुछ ऐसा है जिसका देखा जाना जरूरी है।
अगले ब्लॉग में हम चर्चा करेंगे नागेश कुकुनूर द्वारा निर्देशित फिल्म डोर के बारे में। 

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