Book review: Theek tumhare peeche| Story 7

 A book by Manav Kaul


कहानी- मुमताज़ भाई पतंगवाले।

एक दिन अचानक जब आनंद का फ़ोन आता है तो विवेक अपनी पत्नी तनु से गाँव जाकर मुमताज़ भाई से मिलने की बात करता है। शहर से गुज़रती ट्रेन के बीच उसकी बचपन की यादें उसे घेर लेतीं हैं। किस तरह वह मुमताज़ भाई द्वारा काटी पतंग लूटने के लिए अपने सारे जरुरी काम  छोड़ उसके पीछे दौड़ जाया करता था। या पतंग का नाम मात्र लेने से उसकी माँ उसकी खूब ख़िदमत करतीं थीं। वह दिन की दोपहरी में मुमताज़ भाई से एक अच्छे पतंगबाज बनने के सभी गुर सीखा करता था। उसे लगता था कि मुमताज़ भाई दुनिया के सबसे अच्छे पतंगबाज हैं। एक दिन जब वह इंग्लिश वाले चौहान सर के घर के बाहर से गुजरते मुमताज़ भाई को देखता है तो उनका पीछा करने पर उसे पता चलता है कि उनका भी परिवार है। वह उन्हें धोखेबाज मान बैठता है। उसके अनुसार एक अच्छे पतंगबाज का घर कैसे हो सकता है? उसके बीवी बच्चे कैसे हो सकते हैं? बचपन की नासमझी उसे मुमताज़ भाई से दूर कर देती है। अब वह पतंग नहीं उड़ाता था और न ही उनकी दुकान पर जाता था। ऐसा करने से उसकी माँ, पड़ोसी, रिश्तेदार सभी बहुत खुश थे। स्टेशन पहुँचते ही उसने देखा आनंद उसे लेने आया हुआ है। गांव की तस्वीर अब बदल चुकी थी। मुमताज़ भाई की कमर झुक गयी थी। अब वह पतंग नहीं उड़ाते थे। कुछ देर तीनों वहीं बैठते हैं। विवेक शाम की ट्रेन से वापिस जाने के लिए निकलता है। असमंजस, आंसू, बम्बई के कुछ दोस्तों से बात, ट्रेन आने का इंतजार। 


मानव कॉल की यह कहानी हमें हमारे बचपन की सैर पर लेकर निकल जाती है। स्कूल की छुट्टियों में आसमान में तैरती रंग-बिरंगी पतंगे निश्चित तौर पर हमारे जीवन का हिस्सा रहीं हैं। विवेक जब बचपन में विक्की था तो उसे पतंग वाले मुमताज़ भाई से प्रेम था। वह प्रेम जिसका शब्दों में वर्णन करना कठिन है। जो हम सभी को किसी न किसी से बचपन में हो जाता है। कभी उस दुकानदार से जो हमें ज्यादा सामान खरीदने पर एक चॉकलेट मुफ्त में दे देता है तो कभी उस रिक्शावाले से जो हमें घर से स्कूल तक छोड़ने का काम करता है। यह कहानी उन्हीं मधुर संबंधों को दर्शाती है। बच्चों पर कुछ भी जबर्दस्ती थोपना हमेशा गलत दिशा में उठाया हुआ कदम होता है। विक्की पतंग उड़ाना तो छोड़ देता है पर उसके मन से पतंगबाजी और मुमताज़ भाई कभी नहीं निकल पाते। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी पीड़ा बनकर रह जाती है। वह एक अच्छा पतंगबाज न बन पाने के कारण खुद से घृणा करने लगता है, जो दर्शाता है कि बच्चों को जरुरत से ज्यादा दबाकर रखना उनपर मानसिक रूप से प्रहार है। मानव कॉल की हर कहानी में एक अजीब सा स्वाद घुला हुआ है। मानो उन्होंने जिंदगी को बहुत करीब से पढ़ा है। “मुमताज़ भाई पतंगवाले”–सरल किन्तु प्रभावशाली। 

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