चुस्की यादों की। 

​रात के नौ बज रहे थे। मैंने किचन में जाकर अपनी दूसरी चाय बनाई। दरअसल मुझे दिन में तीन बार चाय पीने की आदत है और अंतिम चाय मैं सोने से कुछ देर पहले लेता हूँ। मुझे शुरू से इतनी चाय पीने की आदत नहीं थी। जब सुधा से मेरी शादी हुई तो वह अपने साथ चाय पीने की आदत भी घर ले आयी। आज भी कभी-कभी चाय छानते वक्त कप की डंडी में फसी उसकी उंगली के साथ मेरी उंगली याद आ जाती है। कभी-कभी जब दूध खत्म हो जाता है तो नीचे जाकर अपनी बिल्डिंग के सामने वाली गुमटी पर चाय पी लेता हूँ। एक दिन यूँ ही चाय पीने नीचे गया हुआ था जब मेरी नज़र सड़क किनारे रेंगते एक बुजुर्ग की तरफ गयी। उसके हाथ में एक पॉलिथीन थी जिसमें छेद होने के कारण लगातार उससे पानी बह रहा था। उस दिन पहली बार इस बात का एहसास हुआ कि मनुष्य होने और इंसान होने में बहुत बड़ा फर्क है। मैंने किसी तरह इंसान होने की कोशिश की और उसे एक पानी की बोतल खरीदकर दे दी। इंसान होना वाकई बहुत कठिन है। इस पूरी प्रक्रिया में हमारी जिंदगी सड़क पर रेंगते किसी केटरपिलर की भांति हो जाती है, जिसे राह चलते लोग कभी जानबूझकर कभी अनजाने में कुचलकर निकल जाते हैं। उस दिन घर आकर मैंने वहाँ जो भी देखा उसे एक तस्वीर का रूप दे दिया। जी हाँ, मैं एक चित्रकार हूँ। और मेरा चित्रकार होना ही मेरे पास ‘और कुछ ना’ होने का कारण है। बहुत सोचने के बाद एक दिन आखरी बार पिताजी से संवाद किया था। संवाद ख़त्म होने के बाद पिताजी मौन थे और मैं किसी उत्तर की अपेक्षा में वहाँ खड़ा-खड़ा माँ और सुधा की तरफ देख रहा था। मैं अपना फ़ैसला पहले ही ले चुका था, मुझे इंतज़ार था तो अपने और पिताजी के उत्तर के मैच होने ना। पिताजी बिना कुछ कहें वहाँ से उठकर चले गए। फिर मैं सुधा के साथ इस घर में आ गया जहाँ मैं इस वक्त बैठकर चाय पी रहा हूँ। माँ पहले छुप-छुपा कर मिलने आ जाया करतीं थीं फिर धीरे-धीरे उनका आना भी छूट गया। मैं बचपन से कोई भी बात दिल में दबाकर नहीं रखना चाहता था। उसे या तो एक तस्वीर का रूप देना चाहता था या उसे कहीं लिखकर महफूज़ रखना चाहता था। शुरुवात में मैं किसी को अपनी तस्वीरें दिखाना भी पसंद नहीं करता था पर जब सुधा ने मेरे काम को सराहा तो मेरे विचार सबके सामने प्रकट होने लगे। आज भी सोचता हूँ कि काश उन्हें कहीं बंद ही रहने देता तो आज मेरे पास कुछ न होने जैसा कुछ नहीं होता। जब पहली बार मुझे मेरी तस्वीरों के जरिए कुछ आमदनी हुयी तो मैंने पिताजी के नाप का एक कोट और पैंट सिलवाकर भेजा था। गुमटी वाले रमेश पर वह बहुत जँचता है। कभी-कभी वह मुझसे चाय के पैसे तक नहीं लेता। नौकरी छोड़ने के बाद मैं हमेशा किताबों और तस्वीरों में घुसा रहता था। उस दिन कमरे में गिलास तोड़ना मुझे आज भी अखरता है। मुझे वह नहीं तोड़ना चाहिए था। मुझे सुधा से माफ़ी मांग लेनी चाहिए थी। शायद उसकी गलती हो ही ना। शायद मेरी कम आमदनी उसकी जरूरतें पूरी ना कर पा रही हो। शायद उसके साथ वहाँ कोई था ही नहीं। न जाने ऐसे कितने शायद काँच के टुकड़ों के साथ फर्श पर बिखरे पड़े थे। रात भर की लंबी ख़ामोशी के बाद सुबह मैं फिर से अकेला हो चुका था। आज बहुत दिनों बाद मैं एक तस्वीर बना रहा हूँ। जिसमें मेरा पूरा परिवार है। पर सुधा नहीं है। क्यों। मैं नहीं जानता। खेर, आखरी चाय बनाने का वक्त हो गया है। चाय की चुस्की मुझे जिंदगी के बहुत सारे किस्से याद दिलाती है। मैं अक्सर आखरी चाय को ठंडा होने के लिए छोड़ देता हूँ। रात को चाय पीने के बाद मुझे बहुत देर तक नींद नहीं आती। 

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