बस यूँ ही। 

“अच्छा तो मैं चलती हूँ” इतना कहकर वह हमेशा की तरह उठकर चली गयी। उसे जाते वक्त दरवाज़ा बंद करने की आदत थी। जैसे वह चाहती हो कि यहाँ का हर कुछ बस यहीं तक रहे। सीमित। जब पहले वह ऐसा करती थी तो मैं चुपके से अपने कमरे की खिड़की खोल कर उसे दूर तक जाते हुए देखता था। न जाने क्यों आज खिड़की खोलने का दिल नहीं किया। उसे जाते हुए देखने का मन भी नहीं किया। आज उसकी बातों में वैसी बेतरतीबी नहीं थी जो पहले हुआ करती थी। वह हर शब्द को तोल-मोल कर बोल रही थी। कुछ देर यह सोचने के बाद कि शायद ‘ऐसा ही होता होगा’ मैं दरवाज़े की तरफ बढ़ा और कुंदी लगाकर वापिस अपने काम मैं जुट गया। उसके जाने के बाद भी उसकी भीनी-भीनी सी महक कमरे में मौजूद थी। मैं टेबल पर बिखरे पड़े कुछ कागजों को जमा कर रखने में मग्न था तभी ख़्याल आया कि क्यों न हम दोनों ने जितना भी साथ जिया है उसे एक कहानी का रूप दिया जाए। हमारी अधूरी यादों के इतने किस्से थे जिससे एक मुक़म्मल किताब लिखी जा सकती थी। मैंने बिना देर किये खिड़की खोली दी। उसकी चुनरी का निचला हिस्सा हवा में लहराता हुआ दिखाई दिया। वह जा चुकी थी। मैंने झट से पेन उठाया और हमारे रिश्ते को एक शीर्षक में बाँध दिया― “बस यूँ ही”। 

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