प्रेम

​उसने अचानक से मुझे जकड़ लिया था। उसने इतनी जोर से मुझे अपनी तरफ खींचा था कि हमारे बीच मौजूद हवा चींखकर हमसे अलग होते हुए मेज़ पर पड़े पत्तों से जाकर लिपट गयी थी और उन्हें कुछ दूरी तक सरसराते हुए आगे ले गयी थी। मैं उसकी छाती के कसाव को अपनी छाती पर महसूस कर सकता था। और उसकी साँसों का बोझ, उससे दूर जाने की पीड़ा को और भी भारी कर रहा था। मैं पहले भी लोगों से, बस्तियों से अलग हुआ था, मैंने पहले भी कई बार शहर बदले थे पर इस बार जैसे मेरी देह को यहाँ मौजूद हर चीज ने बहुत जोर से जकड़ लिया था और छोड़ने का नाम नहीं ले रही थी। मुझे पहली बार लगा जैसे मेरे मुसाफ़िर होने के सभी मायने इस एक जगह आकर खत्म हो गये थे। इस बार संबंध में प्रेम घुला था। वह जिस्मानी नहीं था। बल्कि उससे कमरे में एक रूहानियत कैद थी। जो हर गुज़रती रात के साथ बढ़ती गई थी। ट्रैन आने में अभी कुछ वक़्त बाकी था। पहली बार लगा जैसे उतना समय भी काफी होता है। जब बहुत कुछ पीछे छूट रहा हो। मैंने उसके आँसू पोंछे और अपनी कलाई से घड़ी खोलकर उसे दाहिने हाथ तरफ झील में फेंक दिया। और फिर हम दोनों उसके कमरे की तरफ बढ़ गए। उस रूहानियत को आज़ाद करने के लिए। 

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