ग़ज़ल(4) 

​इतने फ़िगार हैं कि फसाने नहीं आते अब रात भर जगने के बहाने नहीं आते वादा-ए-वस्ल करके वो कुछ गुम हुए ऐसे अब ख्वाब में भी अक्स… Read more “ग़ज़ल(4) “

सवाल

​माना जवाब उनका बवाल वाला था  सवाल भी उनका कहाँ सवाल वाला था।

दरख़्त। 

​दरख़्त जब रोते होंगे पत्ते रुख़्सत होते होंगे। दरख़्त– पेड़। रुख़्सत–अलग।